मेरे दिल के पन्नों में कुछ लमहे दफ़्न हैं,
कुछ आबाद से हैं क़िस्से,
कुछ ग़म में मग्न हैं।
कुछ लमहे ऐसे भी जो ख़ून हैं खौलाते,
तो कुछ ऐसे जिनमें अमन है।
कुछ ख़ुशनुमा पन्ने जीने की राह हैं दिखाते,
तो कुछ लिए खड़े अपने हाथों में कफ़न हैं।
ऐसे ही कुछ पन्नों में मेरे ये लमहे दफ़न हैं।
ये लमहे चुपचाप बिन साज़ कुछ कह जाते हैं,
कुछ ज़ुबान से ज़ाहिर हैं होते, तो कुछ ज़ेहन में रह जाते हैं।
जो करता हूँ ज़ाहिर उन्ही से परखता है ज़माना मुझे,
वो अनकहे क्या जाने कोई, जो अकेले में आँखों से बह जाते हैं।
इनके ऊपर भरोसा भी है, है संदेह भी मुझको,
ये सच की हैं तस्वीर या पागल मुझे बनाते हैं।
ये घेरे मुझे खड़े हैं, जैसे कटघरे हैं।
दायरा है बस बदलता, अकसर दूर ये मेरे हैं।
कुछ विचलित सा मन इन्हें पढ़ने को है करता,
जानना है किस समय के ये फ़ेरे हैं।
दूर भले कभी रह जाते मुझ से परंतु,
फिर कभी ऐसा भी होता जब ये सघन हैं,
बस इन्ही में मेरे कुछ लमहे दफ़न हैं।
खोलीं चिट्ठियाँ वक़्त के तराज़ू की,
याद करने लगा कुछ पल।
पकड़ी क़लम हाथ में फिर,
लिख डाला गुज़रा कल।
हँसी के फ़व्वारे, आँसुओं की बूँद,
कुछ हसीन चटकारे, कुछ बैठे आँखे मूँद,
बह चली स्याही लफ़्ज़ों की पुकार पर,
इनहि लफ़्ज़ों के सहारे, क़लम की है गूँज।
आऊँगा फिर कभी लौट के, अभी तो आपको मेरा नमन है,
जब फिर पूछेगा कोई,
क्यों, कैसे, कहाँ और किन पन्नों में मेरे लमहे दफ़न हैं।
By Vish
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